Sunday, 16 November 2025

DW All becomes influencer

आपने नोटिस किया है, आज कल बहुत सारे सेलिब्रिटीज़-
चाहे टीवी की दुनिया के हों या फिल्मों की-अब वो ऑनलाइन कॉन्टेंट बहुत बनाने लगे हैं?कहीं व्लॉग्स तो कहीं रील्स की शक्ल में वो लगातार
अपनी पर्सनल लाइफ़ परत दर परतआपको दिखाते चले जा रहे हैं.आपने कभी सोचा है क्यों?वो सेलिब्रिटीज़ हैं, रेलिवेंट रहना चाहते हैं, 
आपकी नज़रों में बने रहना चाहते हैं,खबरों में दिखते रहना चाहते हैं.बस इतना ही?या इससे ज़्यादा भी कुछ है?चलिए, आज पता करते हैं कि सेलिब्रिटीज़ क्यों
इन्फ्लुएंसर्स बनने की डेस्परेशन में हैं,जबकि इन्फ्लुएंसर्स तो खुद ही सेलेब बनना चाहते हैं.किसकी होती है कितनी कमाई?लेकिन मैं ये हिसाब किताब शुरू करूं, उससे पहले आप
कॉमेंट में मुझे ये बताइए कि मेरी बात सुनके आपकेज़हन में सबसे पहला ख्याल किसका आया?क्योंकि अब आगे की बातें आप उसी
शख्स को दिमाग में रख कर समझ सकते हैं.देखिए, दुनिया की आबादी है आठ अरब.इनमें से साढ़े पांच अरब लोगों के पास
इंटरनेट है और सोशल मीडिया का एक्सेस भी.और इन साढ़े पांच अरब में से कम से कम
दस करोड़ लोग सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं.आप कुल कितने इन्फ्लुएंसर्स या
कॉन्टेंट क्रिएटर्स को फॉलो करते हैं?दस, बीस, पचास..शायद सौ भी..लेकिन दस करोड़ लोगों का
कॉन्टेंट तो कभी नहीं देख पाएंगे.और ये जो आंकड़ा है, ये लगातार बढ़ रहा है.गोल्डमैन सैक्स ने दो साल पहले पांच
करोड़ इन्फ्लुएंसर्स की बात कही थी.दो साल में ये संख्या दोगुनी हो चुकी
है और ज़ाहिर है आगे और भी बढ़ती रहेगी.क्योंकि जॉब कट्स और इकॉनमिक इंस्टैबिलिटी
के ज़माने में ये एक आसान ऑप्शन लगता है.अमेरिका में हर एक हज़ार इंस्टाग्राम
यूज़र्स पर चौदह क्रिएटर्स या इन्फ्लुएंसर्स हैं.जबकि भारत में सिर्फ डेढ़.यानी इंडियन मार्केट में अभी बहुत पोटेंशियल है.इसका सीधा मतलब ये हुआ कि आने वाले सालों में
हम सैकड़ों हज़ारों नए इन्फ्लुएंसर्स देखेंगे.सोशल मीडिया कंपनियों ने मॉडल ही ऐसा
ग़ज़ब का निकाला- एक हाथ दे, एक हाथ ले.आप एल्गोरिदम्स को कॉन्टेंट फीड
कीजिए, एल्गोरिदम्स आपको पैसा फीड करेगी.इंस्टा पर रील के एक मिलियन पार कर
जाने पर आप एक लाख रुपये तक कमा सकते हैं.वहीं यूट्यूब पर लंबा वीडियो मतलब ज़्यादा
ऐड, तो कमाई दो-तीन लाख की भी हो सकती है.लेकिन कमाई के ज़रिए और भी हैं.फोर्ब्स के आंकड़े दिखाते हैं कि दुनिया का 
सबसे पॉपुलर यूट्यूबर मिस्टर बीस्टसाल के साढ़े आठ करोड़ डॉलर कमाता है.हाईएस्ट अर्निंग इन्फ्लुएंसर्स की लिस्ट उठा कर
देखेंगे तो सब यंग लोग ही दिखेंगे,जिससे दुनिया भर के यूथ को उम्मीद मिलती है कि
चाहो तो तुम भी ऐसा करियर बना सकते हो.क्योंकि ये लोग अब सिर्फ कॉन्टेंट क्रिएटर्स नहीं,
आंत्रप्रेन्योर्स बन चुके हैं और इनके पास कमाई केप्रॉपर रेवेन्यू मॉडल्स हैं.तो चलिए अब पता लगाते हैं कि
इन्फ्लुएंसर्स की कमाई होती कहां कहां से है.सबसे पहला तरीका है- प्लेटफॉर्म-बेस्ड ऐडवर्टाइजिंग
रेवेन्यू- यानी आप जब कोई वीडियो देखते हैं,तो उसके शुरू होने से पहले या बीच में जो ऐड्स
चलते हैं, प्लेटफॉर्म उसका एक शेयर आपको देता है.इसलिए आपने अकसर देखा होगा कि जब किसी के वीडियो 
पर स्ट्राइक आती है और यूट्यूब उसकी मोनेटाइजेशनरोक देता है, तो कॉन्टेंट
क्रिएटर्स को बहुत नुकसान होता है.दूसरा तरीका है- स्पॉन्सर्ड कॉन्टेंट- लोग अकसर
अपनी वीडियोज़ की शुरुआत में बोलते हैं-आज के स्पॉन्सर हैं- यानी कंपनी ने क्रिएटर को 
पैसा दिया है, जिसके बदले में उसे अपने वीडियो मेंएक से डेढ़ मिनट तक कंपनी के बारे में बात करनी होगी.अब ये आप पर है कि आप उसे ट्रेडिशनल टीवी के
कमर्शियल ऐड की तरह देखते हैं या वाकई में मानते हैंकि मेरा पसंदीदा क्रिएटर किसी ब्रांड
की बात कर रहा है, तो वो अच्छा ही होगा.आप कुछ भी समझें लेकिन क्रिएटर और ब्रांड के
बीच में ये सिर्फ एक ट्रांज़ैक्शनल रिलेशनशिप है.ब्रांड को आप तक पहुंचना है.क्रिएटर को पैसा कमाना है.क्लासिक सिम्बायोटिक रिलेशनशिप
- दोनों का फायदा ही फायदा.कई बार इसे स्पॉन्सरशिप बोलने की जगह
ब्रांड कोलैबोरेशन का नाम दिया जाता है.यानी मैं ना केवल आपको किसी प्रॉडक्ट के बारे में
बताऊंगी, बल्कि उसे इस्तेमाल कर के भी दिखाऊंगी.अब ये बहुत सब्टल तरीके से भी किया 
जा सकता है और पूरी बेशर्मी से भी.डिपेंड करता है आपको कितना पैसा मिल रहा है.भारत में क्रिएटर्स की नब्बे
फ़ीसदी कमाई ब्रांड डील्स से ही होती है.ये वैसा ही है जैसे किसी ज़माने में
शाहरुख़ ख़ान लक्स से नहाते हुए दिखते थे.लेकिन क्या वो वाकई लक्स
इस्तेमाल करते होंगे, ये आप तय कर लीजिए.खैर, इसी तरह से अफ़िलिएट मार्केटिंग भी की जाती है.मतलब मैं कहूं कि फलां प्रॉडक्ट का जो लिंक
है वो लिंक मेरी डिस्क्रिप्शन में मौजूद है.तो जितनी बार आप उस पर क्लिक
करेंगे, उतनी बार मुझे कमीशन मिलता रहेगा.आज कल डोनेशन्स का ऑप्शन भी है.मान लीजिए मेरे दस लाख फॉलोअर्स हैं और हर कोई मेरी
वीडियो पर मुझे पांच रुपया भी डोनेट कर दे,तो बन गए मेरे पचास लाख- एक ही वीडियो में– 
नॉट बैड एट ऑल!इसी तरह कुछ लोग- जो अपने कॉन्टेंट को
एक्सक्लूसिव रखना चाहते हैं, वो सब्स्क्रिप्शन मॉडलइस्तेमाल करते हैं.उनका कॉन्टेंट पे वॉल के पीछे छिपा होता है.वहां भी यही लॉजिक है कि एकदम मिनिमल फी
भी लगाएंगे, तो भी ठीक ठाक कमाई हो जाएगी.क्योंकि यूज़र की जेब से तो सौ-पचास ही जाएगा ना.तो वो दे भी देगा.लेकिन भारत में इस मॉडल के
लिए एक्सेप्टेंस अभी बहुत कम है.बहुत गिनती के ही लोग इसे चला पा रहे हैं.अब अगर आप मॉडरेटली पॉपुलर हो गए हैं, 
तो आप अपना खुद का मर्चेंडाइज़या अपना ब्रांड लॉन्च कर सकते हैं.जैसे मिस्टर बीस्ट ने अपना चॉकलेट
ब्रांड लॉन्च किया, बर्गर ब्रांड लॉन्च किया.लोग आपके प्रॉडक्ट्स खरीदेंगे, उससे आपकी कमाई होगी.मार्केट में आपके बारे में और बात होंगी.आपको इवेंट अपीयरेंसेज़ के लिए बुलाया जाएगा.उसके भी आप मोटे पैसे चार्ज करेंगे.और ये एक साइकिल की तरह चलता रहेगा.क्योंकि जितने ज़्यादा इवेंट्स में जाएंगे, उतनी
ज़्यादा विज़िबिलिटी बढ़ेगी, उतना ही आपका रेट औरबढ़ेगा और आप धीरे धीरे
इन्फ्लुएंसर से सेलिब्रिटी बन जाएंगे.मिशन अकम्प्लिश्ड.और ये कमाई के मैंने अभी जितने ज़रिए बताए,
ये सब डिपेंड करते हैं इस बात पर कि आपके कितनेज़्यादा फॉलोअर्स हैं.क्योंकि इस संख्या के आधार पर
आपका क्लास डिवीज़न किया जाता है.जैसे यूट्यूब हर माइलस्टोन पर
आपको एक अलग रंग का प्ले बटन भेजता है.वैसे ही, जब आप कॉन्टेंट क्रिएशन की दुनिया में
शुरुआत करते हैं, तो एक से दस हज़ार के बीच फॉलोअर्सआपको बना देते हैं नैनो इन्फ्लुएंसर.दस से पचास हज़ार फॉलोअर्स के साथ
आप बन जाते हैं माइक्रो इन्फ्लुएंसर.फिर पचास हज़ार से ढाई लाख तक आप
कहलाते हैं मिड-टियर इन्फ्लुएंसर.ढाई से दस लाख के बीच आपका रुतबा
बन जाता है मैक्रो इन्फ्लुएंसर का.और दस लाख के बाद आप ऑफिशियली बन 
जाते हैं मिलियनेयर या फिर मेगा इन्फ्लुएंसर.सीधी भाषा में- सेलिब्रिटी.जितने ज़्यादा फॉलोअर, उतनी ज़्यादा कमाई.नैनो इन्फ्लुएंसर्स महीने में
बमुश्किल दस हज़ार रुपये तक कमा पाते हैं.और सेलिब्रिटी– लाखों, करोड़ों.क्रिस्टियानो रोनाल्डो एक पोस्ट
के बीस से पच्चीस लाख डॉलर लेते हैं.तो अगर एंड गोल सेलिब्रिटी बनना ही है, तो
फिर सेलेब्स क्यों कॉन्टेंट बनाने में लगे हैं.इसलिए कि कोविड के बाद से
ऑडियंस बहुत ज़्यादा बंट गई है.लोग अब टीवी कम देख रहे हैं- ख़ासकर यंग लोग.कोविड से पहले की तुलना में
अब लोग सिनेमा भी कम जा रहे हैं.क्योंकि अब डिजिटल ऑप्शन्स बहुत हैं.यंग ऑडियंस सोशल मीडिया के साथ साथ
ओटीटी भी अपने फोन पर ही देख लेती है.तो किसी ना किसी तरह आपके फोन तक पहुंचना 
बहुत ज़रूरी है- रेलिवेंट रहने के लिए भीऔर कमाई करने के लिए भी.इसलिए कभी आपको ये लोग
पॉडकास्ट्स में दिखेंगे, कभी व्लॉग्स में.कभी ये अपना ब्रांड प्रमोट
करते दिखेंगे, कभी किसी और का.भारत में इंस्टाग्राम के पास हर
महीने दो अरब एक्टिव यूज़र्स आते हैं.इन्फ्लुएंसर्स के लिए इंस्टा
कमाई का सबसे अहम ज़रिया है.यूट्यूब के मुकाबले ये आसान भी है-
यहां आपको छोटे वीडियो बनाने होते हैं.इतने लंबे डीप डाइव वीडियो बनाने में तो
बहुत ज़्यादा मेहनत लगती है और रिसर्च भी.ऊपर ऊपर से देखेंगे तो ये इन्फ्लुएंसर इकॉनमी बहुत
हाल फिलहाल का कॉन्सेप्ट लग सकता है लेकिन दो कदमपीछे जा कर देखिए तो समझ आएगा कि
इसमें एक्चुअली नया कुछ भी नहीं है.देखिए, मास मीडिया की अगर बात की जाए, तो
पहले सिर्फ रेडियो और अख़बार हुआ करते थे.बहुत चुनिंदा लोग रेडियो में काम करते थे.उनकी आवाज़ पूरा देश सुनता था.वो मीडिया के शुरुआती इन्फ्लुएंसर्स थे.सुनने वाले उन्हीं के स्टाइल में बोलने की
कोशिश करते थे, उन्हें चिट्ठियां लिखा करते थे.वो जो सब कहते थे- उससे इन्फ्लुएंस होते थे.अमीन सय्यानी की आवाज़ को कौन भूल सकता है.ऑडियो के बाद आया विज़ुअल मीडियम- सिनेमा.अब सिर्फ बोलने का नहीं,
चलने का भी स्टाइल कॉपी होने लगा.लोगों को अपने हीरो जैसे कपड़े सिलवाने होते थे.एंग्री यंग मैन वाला लुक क्रिएट करना होता था.ये विज़ुअल मीडियम फिर बड़े परदे से
निकल कर घरों तक आया- टीवी की शक्ल में.अब इन्फ्लुएंसर्स बन गए टीवी एंकर्स.सलमा सुलतान के बालों में लगे गुलाब से लेकर
शम्मी नारंग की जेब में रखे पेन तकहर स्टाइल कॉपी होने लगा.और फिर आया...इंटरनेट.इसने सबको मौका दे दिया इन्फ्लुएंसर बनने का.इंटरनेट के शुरुआती दिनों
में ब्लॉगिंग खूब पॉपुलर हुई थी.हर कोई अपना ओपिनियन लिख सकता
था, दूसरों तक पहुंचा सकता था.जहां कुछ खास लोग ही अख़बारों में एडिटोरियल्स
लिख पाते थे, वहीं ब्लॉगिंग की दुनिया नेसबको आवाज़ दे दी.इंटरनेट- लेगेसी मीडिया को डेमोक्रटाइज़ करता गया.एडिटोरियल्स की जगह ब्लॉग्स, रेडियो की
जगह पॉडकास्ट्स और टीवी और सिनेमा की जगहव्लॉग्स और रील्स.फर्क बस इतना कि अब चुनिंदा इन्फ्लुएंसर्स की
जगह लाखों करोड़ों लोग इन्फ्लुएंसर बन सकते हैं.जिस किसी के हाथ में फोन है,
वो खुद से कोशिश कर सकता है.पिछले दस साल में ये ग्राफ
इतनी तेज़ी से ऊपर गया है.इन्फ्लुएंसर इकॉनमी जो कि 2015 में महज़ एक
अरब डॉलर की थी- आज तैंतीस अरब डॉलर की हो गई है.लेकिन यहां एक सवाल- अगर किसी दिन सोशल मीडिया ही
बंद हो जाए, तो इस इन्फ्लुएंसर इकॉनमी का क्या होगा?आपको नेपाल का ख्याल आया होगा.लेकिन और भी देश हैं.अफगानिस्तान ने सोशल मीडिया पर रोक लगाईं है.उत्तर कोरिया में रोक है.ऑस्ट्रेलिया ने सोलह साल तक के
बच्चों के लिए सोशल मीडिया बंद कर दिया है.और भी कई देश ऐसा करना चाहते हैं.चाइना में तो फेसबुक, ट्विटर वगैरह वैसे ही
नहीं हैं- वहां चाइनीज़ ऐप्स इस्तेमाल होती हैं.लेकिन नियम कायदों के साथ.वहां स्क्रीन टाइम लॉ फॉलो होता है.इसके तहत बच्चों को इंटरनेट अलाउड है
लेकिन सिर्फ एजुकेशनल पर्पसेज़ के लिए.आठ साल से कम के बच्चे चालीस
मिनट से ज़्यादा फोन पर नहीं रह सकते.आठ से ग्यारह साल तक के बच्चों को एक घंटा 
अलाउड है, बारह से पंद्रह की उम्र में डेढ़ घंटा,और सोलह से सत्रह में दो घंटे क्योंकि स्कूल के
प्रोजेक्ट पूरे करने के लिए टाइम चाहिए.और रात दस बजे से सुबह छह बजे तक
बच्चों को स्क्रीन देखने की इजाज़त नहीं है.बच्चे सिर्फ माता पिता का ही फोन इस्तेमाल कर सकते
हैं और उन फोन्स की बाकायदा मॉनिटरिंग होती हैताकि सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे फोन पर नहीं हैं.चीन की ये डिटेल देना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि जहां
कोविड के बाद से दुनिया भर में बच्चों के हाथ मेंफोन आ गया है, वहीं चीन इसे
बच्चों के हाथ से छीन रहा है.कोविड के दौर में मजबूरी थी.पढ़ाई घर से हो रही थी.स्क्रीन के बिना ये मुमकिन ही नहीं था.और तब जो बच्चों को स्क्रीन मिलीं, वो
नॉर्म बन गया कि बच्चे तो स्क्रीन पर रहेंगे ही.और इसी का फायदा सोशल मीडिया कंपनियां उठाती रही हैं.इन्फ्लुएंसर्स सबसे ज़्यादा
टीनेजर्स को टारगेट करते हैं.ये दो धारी तलवार है- पहला टीनेजर्स इन्फ्लुएंसर्स
के बताए प्रॉडक्ट्स खरीदना चाहेंगे और दूसरा वो खुदआगे चल कर इन इन्फ्लुएंसर्स जैसा बनना चाहेंगे.सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को हर
तरह से इन यंग लोगों की ज़रूरत है.लेकिन चाइना- इज़ वन स्टेप अहेड- वो
बच्चों को इस जाल में फंसने ही नहीं देना चाहता.अब जहां बाकी देश सोशल मीडिया पर 
सख्ती दिखाने की कोशिश कर रहे हैं,वहीं भारत इससे बिल्कुल उल्टी 
दिशा में जाता हुआ दिखता है.क्योंकि इन्फ्लुएंसर्स यहां सिर्फ प्रॉडक्ट्स ही
नहीं बेच रहे हैं, पॉलिटिक्स भी डिफ़ाइन कर रहे हैं.भारत में इन्फ्लुएंसर्स को मोटिवेट करने के 
लिए नेशनल क्रिएटर अवॉर्ड दिए जाते हैं,जिन्हें बाकायदा सरकार आयोजित करती है.और देश के सबसे पॉपुलर इन्फ्लुएंसर
खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं.मोदी के पास मोस्ट फॉलोड वर्ल्ड
लीडर ऑन सोशल मीडिया का ख़िताब है.देश के युवाओं तक पहुंचने के लिए मोदी सरकारहर मुमकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 
का इस्तेमाल करती रही है.इन फ़ैक्ट, अब तो आंकड़े दिखा रहे हैं कि 
देश में नेता पत्रकारों को नहीं,इन्फ्लुएंसर्स को इंटरव्यू देना पसंद करते हैं.क्योंकि पत्रकार क्रिटिकल सवाल करेंगे, 
इन्फ्लुएंसर को क्रिटिकल होने की ज़रूरत नहीं है.नतीजतन अब पत्रकारों पर इन्फ्लुएंसर
स्टाइल इंटरव्यूज़ करने का दबाव बनने लगा है.तो इस लिहाज़ से भारत में इंटरनेट या
सोशल मीडिया के बंद हो जाने का डर नहीं है.भारत की क्रिएटर इकॉनमी अभी बहुत नई है.करीब पच्चीस लाख डिजिटल कॉन्टेंट क्रिएटर्स के साथ
भारत अमेरिका और ब्राज़ील के बाद दुनिया मेंतीसरे नंबर पर है.फिलहाल, इनमें से सिर्फ दस फ़ीसदी यानी
करीब ढाई लाख लोग अच्छी कमाई कर पा रहे हैं.तो अगर आप भी कॉन्टेंट क्रिएटर बनने की राह पर हैं,
तो याद रखिएगा कि आपके पास मौका ज़रूर है,लेकिन हर इंडस्ट्री की तरह यहां भी कुछ ही
लोग करोड़ों कमाएंगे- हर कोई नहीं.और आपको अपने लिए ये एथिक्स भी तय 
करने होंगे कि पैसा कमाने के लिए आपकिस तरह के कॉन्टेंट को पुश करेंगे.अगर आपने आज इस वीडियो से कुछ नया सीखा है 
तो शेयर करिए इस वीडियो कोक्योंकि हमारे पास ना स्पॉन्सर्स हैं, ना कोलैब्स.हमारे पास सिर्फ आपके दिए हुए व्यूज़ और
कॉमेंट्स हैं, मैं मिलूंगी आपसे अगली बार, नमस्कार.

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आपने नोटिस किया है, आज कल बहुत सारे सेलिब्रिटीज़- चाहे टीवी की दुनिया के हों या फिल्मों की-अब वो ऑनलाइन कॉन्टेंट बहुत बनाने लगे हैं?कहीं व्ल...